स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म १८२४ ई. गुजरात राज्य में
टंकारा नामक एक छोटे से नगर में एक रूढ़िवादी ब्राहमण के घर में हुआ था | उनके बचपन का नाम
मूलशंकर था | अल्पायु में ही मूर्तिपूजा में उनका विश्वास नही रहा | १८४५
ई. में वे विवाह होने से पहले ही अपना घर छोडकर
चले गए थे और १८६१ ई. तक वे एक ब्रहाचारी साधु के रूप में भारत के बिभिन्न स्थानों
का भ्रमण करते रहे |१८६१ ई. में उन्होंने मथुरा के स्वामी विरजानन्द को अपना गुरु
बनाया वही पर उन्होंने वेदों का अद्ययन
किया | अपने गुरु से दीक्षा लेकर उन्होंने हिन्दू धर्म सभ्यता भाषा के प्रचार का
कार्य आरम्भ किया और सर्बप्रथम मुम्बई में १८७५ ई. आर्य समाज की स्थापना की | तत्पश्चात वे भारत
के बिभिन्न स्थानों पर घूम -घूम कर अपने विचारो का प्रचार करते रहे |आर्य समाज का
मुख्य उद्देश्य भारत में हिन्दू धर्म एवं समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं बुराईयो
को समाप्त करना और वैदिक धर्म की पुनस्थापना करना था |
आर्य समाज के सिद्धांत
आर्य समाज के दस सिद्धांत निम्नाकित है |
(१)
वेद ही
सत्य-ज्ञान के स्त्रोत है , अतः वेदों का अध्यन आवश्यक है |
(२)
वेदों के अधार पर
मन्त्र-पाठ और हवन करना |
(३)
मूर्ति-पूजा का
खंडन |
(४)
तीर्थ यात्रा और
अवतारवाद का विरोध |
(५)
कर्म और
पुनर्जन्म अथवा जीवन के आवागमन के सिद्धांत में विश्वास |
दयानंद सरस्वती अथवा आर्य समाज के कार्य
उपयुक्त सिधांतो के आधार पर आर्य समाज ने हिन्दू धर्म और
समाज के सुधार हेतु निम्नांकित महत्वपूर्ण कार्य किए |
(1) धार्मिक सुधार कार्य_ धार्मिक क्षेत्र में आर्य समाज ने मूर्ति-पूजा , कर्मकांड
, बलि प्रथा ,स्वर्ग और नरक की कल्पना तथा भाग्य में विश्वास का विरोध किया | उसने
वेदों की क्षेष्टता का दावा किया और उसी आधार पर मन्त्र पाठ , हवन , यज्ञ , कर्म ,
आदि पर बल दिया |
(2) सामाजिक सुधार कार्य
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने समाजिक क्षेत्र में सराहनीय
सुधार किए | उन्होंने बाल-विवाह , बहु-विवाह पर्दा-प्रथा सती प्रथा , जाति प्रथा ,
छुआछूत , अशिक्षा , आदि समाजिक बुराईयों का विरोध किया तथा स्त्री शिक्षा ,
अंतरजातीय विवाह एवं विधवा विवाह का समर्थन किया |
(3)
साहित्यिक एवं शैक्षणिक सुधार कार्य
आर्य समाज ने साहित्यिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में भी काफी
महत्वपूर्ण कार्य किए | उन्होंने हिन्दी भाषा में पुस्तके लिखकर हिंदी भाषा को
सम्रध बनाया | वे नारी शिक्षा के भी प्रबल समर्थक थे | उन्होंने संस्कृत भाषा के
महत्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास भी किया |
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