बाल
गंगाघर तिलक ( १८५६ -१९२० ई० ) भारत में उग्र रास्ट्रबाद के जन्मदाता और
प्रतिभाशाली ,कर्तव्यनिष्ठ तथा दढप्रतिज्ञ देशभक्त थे | स्वराज्य शब्द की
प्रतिस्थापना करने वाले तथा भारतीयों में रास्ट्रीयता की भावना भरने वाले नेता तिलक
जी ही थे ,जिन्हें आज सारा देश आदरपूर्वक लोकमान्य तिलक के नाम से याद करता है |
भारतीयों में
नवजागरण हेतू मराठा और केसरी नामक समाचार-पत्रों को प्रारम्भ करने का श्रेय इन्ही
को दिया जाता है | इनका यह कथन कि ‘’ स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध
अधिकार है और मै इसे लेकर रहूँगा ‘’ आज भी जनमानस को देश-प्रेम
की प्रेरणा देता है | तिलक जी भारतीय राष्ट्रबाद के जनक तथा भारत माता के मस्तक के
तिलक थे | वे भारतीयो में
देश –प्रेम की ज्योति जलाने वाले
पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज्य की प्राप्ति को ,अपना जन्मसिद्ध अधिकार घोषित
किया | इनके जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रेरक प्रसंग निम्न प्रकार है __यह प्रसंग तिलक
जी के बिधाथ्री –जीवन की एक घटना से सम्बंधित है | एक दिन उनके इतिहास के अध्यापक कक्षा में
बिधाथ्रीयो को कोई पाठ समझा रहे थे अचानक उनकी द्ररस्टी फर्श पर पड़ी | वहां मूंगफली
के छिलके बिखरे पड़े थे | अध्यापक क्रोध से आग –बबूला हो उठे | उन्होंने किसी भी बिधार्थी से कुछ नही पुचा वरन तुरंत एक
छड़ी उठाई और एक सिरे से सभी बिधार्थीयो को पीटना शुरू कर दिया |जब अध्यापक तिलकजी
के पास पहुचे तो उन्होंने निर्भीकता के साथ कहा मुझे मत मारिए | जब मैने कोई
गलती नही की तो मै सजा क्यों भुगतू ? ‘’ अध्यापक का हाथ तुरंत रुक
गया और वे तिलक को पीटे विना ही वापस लौट गए |
Saturday, 1 August 2015
स्वामी दयानंद
आर्य समाज के संस्थापक और हिन्दू धर्म के महान रक्षक और उधारक् स्वामी
दयानंद सरस्वती (१८२४ -१८८३ ई० ) भारत की एक महान बिभूति थे | उन्होंने हिन्दुओ में
व्याप्त धार्मिक अंधविश्वास ,आडम्बरो, कुरीतियों आदि को दूर किया | उन्होंने
;स्वराज्य का नारा लगाकर भारतीयो में रास्ट्रीय चेतना का शंखनाद किया | उन्होंने
भारतीयो को उनके प्राचीन गौरव का स्मरण कराया और उनके विलुप्त स्वाभिमान को जाग्रत
करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी | स्वामी दयानंद ने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थ
प्रकाश की रचना की ,गैर हिंदी भाषी होते हुए भी उन्होंने अपने इस ग्रन्थ को हिंदी
में लिखा और सर्व प्रथम घोषणा की कि भविष्य में भारत की रास्त्र भाषा हिंदी ही होगी
|१९७५ ई० में मुंबई में
स्थापित आर्य समाज की शाखाए आज लगभग सभी नगरो में हैं | स्वामी दयानंद आधुनिक भारत
के महान संत ,महापुरुष ,महान धर्म व समाज सुधारक तथा सच्चे देश भक्त थे | उन्होंने
हिन्दू समाज की कुरीतियों का प्रबल बिरोध किया ,बिधवा पुनविर्वाह तथा स्त्री शिक्षा
को प्रोत्साहन दिया तथा भारतीयों को स्वराज्य के महत्त्व से
परिचित कराया | इनके जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रेरक प्रसंग निम्न प्रकार है __एक बार
जब स्वामी दयानंद जोधपुर –नरेश के यहाँ आतिथ्य ग्रहण
किए हुए थे ,तब स्वामीजी ने जोधपुर नरेश को एक वेश्या के साथ देख लिया | इस पर
उन्होंने राजा और वेश्या दोनों को बहुत बुरा –भला कहा |राजा तो लज्जित होकर चुप रह गए ,लेकिन वेश्या ने अपने अपमान का
बदला लेने का निश्चय कर लिया | उसने स्वामी जी के रसोईये से मिलकर ,उन्हें दूध मे
विष और पिसा हुआ कांच मिलाकर पिला दिया | स्वामी जी को शीघ्र ही इस बात का पता चल
गया | उन्होंने रसोईये को कुछ रुपये देते हुए कहा कि__ मेरा तो अन्त समय निकट आ गया है,लेकिन तुम इन
रुपयों को लेकर भाग जाओ ,नही तो तुम पकडे जाओगे | रसोईया स्वामीजी की इस उदारता पर
फूट-फूट कर रोने लगा और अपनी करनी पर पश्चाताप करने लगा |
राज-चिह
भारत का राज-चिह मौर्य सम्राट अशोक द्वारा सारनाथ में स्थापित ;सिंह स्तम्भ
; से लिया गया है | भारत सरकार द्वारा यह चिह २६ जनबरी ,१९५० को अपनाया गया |इस राज
चिह के मूल स्तम्भ में शीश्र पर चार सिंह है, जो एक –दूसरे के बिपरीत दिशा में पीठ किये हुए है जिससे चार में से केवल तीन सिंह
ही दिखाई पड़ते हैं |इनके नीचे घंटे के आकार के पदम् के ऊपर एक चित्रवल्लरी के एक
हाथी है |सिंह शीर्ष के नीचे स्थित पट्टी के मध्य में उभरी हुई नक्काशी में चक्र
है,जिसके दाई ओर एक सांड और बाई ओर चौकड़ी भरता हुआ एक घोडा है तथा एक सिंह की उभरी हुई
मूर्ति है, जिसके बीच-बीच में चक्र बने हुए हैं | आधार के पदम को खाली छोड़ दिया गया
हैं | फलक के नीचे मुणडकोपनीषद से उद्धत सूत्र ,सत्यमेव जयते , लिखा गया है,जिसकी
लिपि देवनागरी है | इसका अर्थ है कि ;सत्य की ही विजय होती है; |
नेशनल फ्लेग
भारत का नेशनल फ्लेग ‘तिरंगा, है | इसमे तीन समान
चौड|ई की समान्तर पट्टीया है
सबसे ऊपर केसरिया ,बीच में सफेद और नीचे गहरी
हरी पट्टी है | इनमे से केसरिया शक्ति का
प्रतीक ,श्वेत शांति का प्रतीक है
| ‘तिरंगा , की श्वेत पट्टी के बीच में
एक चक्र है,जिसका रंग नीला है और उसमे
२४ तीलिया है यह चक्र मोर्य सम्राट अशोक द्वारा सारनाथ में स्थापित सिंह स्तम्भ पर
बने चक्र से लिया गया है | flag की लम्बाई और
चौड|ई का अनुपात ३: २ है
| नेशनल फ्लेग का प्रारूप
संबिधान निमार्त्री सभा द्वारा २२
जुलाई ,१९४७ को अपनाया गया और १४
अगस्त ,१९४७ को प्रस्तुत किया गया
|
इलेक्ट्रोनिक मेल
ई
–मेल के माध्यम से आप अपने
कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर उपयोगकर्ताओ को संदेश भेज सकते है | ई
–मेल के जरिए आप किसी से भी
उसी तरह पत्र –व्यबहार कर सकते है ,जेसे आप
फोन –कॉल करते है| लेकिन टेलीफोन
से अलग ई –मेल से आप सन्देशो को
संरर्षित करके रख भी सकते है और वर्ड प्रोसेसिंग डॉक्यूमेंटो या इमेजों की तरह
दूसरो को फाइलें भी भेज सकते है | इसके अलावा ई –मेल तब भी भेजा जा सकता है,
जब प्राप्तकर्ता उस कंप्यूटर या पते पर मौजूद नहीं हो |यह संदेश उस कंप्यूटर मे तब तक
रहेगा , जब तक कि प्राप्तकर्ता ( वह ब्यक्ति जिसे संदेश भेजा गया है | ) अपने
कंप्यूटर पर मेल बॉक्स खोलकर इसे देख नहीं लेता |ई –मेल भेजने के लिए आपको सही
कम्यूनिकेशन्स सॉफ्टवेर व माडेम की जरूरत होती है| साथ ही इंटरनेट कनेक्शन भी आपको
लेना पड़ेगा |
इंटरनेट
इंटरनेट द्वारा विश्वभर के लाखों कंप्यूटर सूचना-केन्द्रों से प्राप्त
सूचनाओ व आकड़ो को अपनी भाषा मे बड़ी सरलता से प्राप्त किया जा सकता है |इस विधि को
‘ट्र|न्समिशन कंट्रोल
प्रोटोकॉल या इंटरनेट प्रोटोकॉल ‘ कहा जाता है | इंटरनेट
इंटरनेशनल नेटवर्क का संछिप्त नाम है इंटरनेट सेवा के कारण कोई ब्यक्ति घर बैठे देश
–बिदेश की प्रत्येक घटना को
देख सकता है और उनसे सम्पर्क स्थापित कर सकता है | भारत में इंटरनेट का प्रवेश बर्ष
१९८७ -८८ में हुआ था | जनसमान्य के लिए इसकी सुबिधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से १५
अगस्त ,१९९५ को बिदेश संचार निगम लिमिटेड ने ‘गेटवे इंटरनेट’ सेवा आरम्भ की | इंटरनेट
कंप्यूटर के माध्यम से लोकल कॉल ,एस .टी.डी .या आई.एस.डी. किसी भी माध्यम को अपनाने
पर लोकल कॉल का ही चार्ज लगता हैं
भारतीय रिजर्व बैंक
यह
भारत का केन्द्रीय बैंक है | १ अप्रैल ,१९३५ को ५ करोड़ रुपये की अधिकृत पूंजी के
साथ रिजर्व बैंक की स्थापना की गई | १ जनबरी ,१९४९ को रिजर्व बैंक का रास्ट्रीयकरण
किया गया |रिजर्व बैंक का मुख्यालय मुंबई मे है | केन्द्रीय बोर्ड के अतिरिक्त
आर.बी.आई के चार स्थानीय बोर्ड भी हैं जिनके मुख्यालय मुम्बई ,कोलकाता ,चेन्नई तथा
नई दिल्ली मे है | वर्तमान समय मे आर .बी.आई करेंसी नोट जारी करने के लिए न्यूनतम
निधि पद्धति अपनाता है | इस पद्धति मे आर.बी.आई के पास स्वर्ण एवं विदेशी रण पत्र
कुल मिलाकर किसी भी समय २०० करोड़ रूपऐ के मूल्य से कम नहीं होने चाहीए जिसमे स्वर्ण
का मूल्य ११५ करोड होना आवश्यक है |
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